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मीडिया की आजादी, जिम्मेदारी और हालिया एनडीटीवी प्रतिबंध प्रकरण!

Posted On: 18 Nov, 2016 Others,Business,Others में

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देखा जाए तो इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि मीडिया को आजाद होना चाहिए. इसके साथ यह भी प्रश्न जुड़ जाता है कि मीडिया को जवाबदेह भी होना चाहिए, मतलब उसे स्वच्छन्द नहीं होना चाहिए. ध्यान से इन लाइनों को पढ़िए और आज की मीडिया कवरेज और उसकी टीआरपी चाहत को तौलिये, फिर आप कहीं ना कहीं दोनों पैमानों में फंस जायेंगे. कुछ ऐसा ही सरकार के लिए भी कहा जाता है कि वह तमाम संस्थाओं को आजादी से कार्य करने दे, तो देशहित में सख्ती से प्रशासनिक व्यवस्था को भी दुरुस्त रखे! अब आप माथापच्ची करते रहिए कि क्या सही है, क्या गलत है? कहां कौन सा रास्ता जाता है और कौन सा रास्ता कहां बंद होता है? देखा जाए तो मीडिया और सरकार दोनों की कार्यप्रणाली के बारे में उद्धृत किये गए उपरोक्त दो-दो स्टेटमेंट एक दुसरे के पूरक ही हैं. ठीक साइकिल के अगले और पिछले पहियों की तरह, किन्तु विपरीत दिशा में चलने से दोनों परिभाषाएं एक-दुसरे से विपरीत नज़र आती हैं. एनडीटीवी यूं तो टीआरपी की रेट में सबसे पिछड़ा हुआ है चैनल माना जाता है, पर यहाँ भी द्वंद्व है कि यह चैनल चर्चित भी खूब रहता है, किसी भी दूसरे चैनल से ज्यादा! कहने का अभिप्राय है कि तमाम बुद्धिजीवी, प्रतिक्रिया देने वाले लोग इस चैनल की सकारात्मक-नकारात्मक खूब चर्चा करते हैं, सोशल मीडिया पर अक्सर इसका समर्थन या ट्रोल करने की खबरें आती रहती हैं. यह कुछ तथ्य इसलिए मैं सामने रखने का प्रयत्न कर रहा हूं, ताकि पूरा मामला समझ आ सके. इन चर्चाओं की कड़ियों को हम आगे जोड़ेंगे और इसी में अगली कड़ी है राजनीति की. वर्तमान केंद्र सरकार से पहले की जो यूपीए सरकार थी, निसंदेह रूप से जनता ने उसे खारिज कर दिया था और ढाई साल बीत जाने के बाद वर्तमान सरकार में कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आया है और दूसरे मोर्चों पर भी सरकार ने ठीक-ठाक अचीवमेंट हासिल की है. हालाँकि, सरकार के समर्थक तो यह कहेंगे कि सरकार ने बहुत कुछ हासिल किया है, पर यह बात निष्पक्ष व्यक्ति भी मानेगा कि ठीक-ठाक अचीवमेंट सरकार ने हासिल की है. यह ठीक-ठाक अचीवमेंट बड़ी नज़र आने लगती है, अगर पिछली सरकार से हम वर्तमान सरकार की तुलना करें. खैर, राजनीति का सवाल यह है कि कई जमे हुए ‘लुटियन लोगों’ को यह बातें हज़म नहीं हो सकी हैं. Freedom of Speech, NDTV India Ban, Hindi Article, New, Modi Government, freedom vs free will, Changing Politics, Ravish Kumar Journalist, Social Media Reaction

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निस्संदेह सरकार के समर्थक और कई दुसरे लोग भी एनडीटीवी और रविश कुमार को इसी पैमाने पर रखते हैं और यही वह छवि है जो रविश कुमार की बनी है या बनायी गयी है. वैसे भी, संतुष्टि इतनी आसान नहीं होती और सरकार बदलने से दशकों से जमे कई लोगों के भीतर नाराजगी भी रही है और उस नाराजगी को जाहिर करने के लिए जो कुछ मुद्दे निमित्त बने हैं वह गौरक्षा, दादरी कांड, सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत, फर्जी एनकाउंटर, वन रैंक-वन पेंशन इत्यादि बनते रहे हैं. ऐसे ही तमाम मुद्दों पर सरकार को जबरदस्त ढंग से घेरने की कोशिश की गई है और एनडीटीवी के रवीश कुमार इस मामले में सबसे आगे रहने वालों में से रहे हैं. जाहिर तौर पर सरकार या उसके समर्थक उन्हें पसंद नहीं करते हैं और उनका खुल कर विरोध भी करते रहे हैं, गाली-गलौच करते रहे हैं. इसी विरोध ने रवीश कुमार की छवि ‘लार्जर दैन लाइफ’ वाली बना दी है. सरकार के तमाम विरोधी उनकी पीठ थपथपाते नजर आते हैं कि कोई तो है जो सरकार को भीतर तक कुरेदता है. रवीश कुमार अपनी इस यूएसपी को खूब समझते हैं और निष्पक्ष पत्रकारिता की आड़ में इसी सहारे कई बार पक्षपात पूर्ण रवैया भी अख्तियार करते हैं. सोशल मीडिया जैसे माध्यमों पर उनकी समय-समय पर होनेवाली खिंचाई प्रतिक्रिया के रूप में सामने आती रही है. जहां तक बात सरकार की है तो अभी तक एनडीटीवी के रवीश कुमार के ऊपर वह इतनी गंभीर नहीं दिखी थी, पर 1 दिन का प्रतिबंध लगा कर सरकार ने रवीश कुमार की छवि और भी ज्यादा बड़ी कर दी है. इससे कई प्रश्न उठे हैं, तो सरकार को भी चहुंओर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है. विपक्षी नेताओं के अतिरिक्त पत्रकार जगत के बड़े नामों ने इसके लिए सरकार की आलोचना की है तो एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी चैनल का प्रसारण एक दिन के लिए रोकने के एक अंतर-मंत्रालयी पैनल के अभूतपूर्व निर्णय की कड़ी आलोचना की है और इसे प्रेस की स्वतंत्रता का ‘‘प्रत्यक्ष उल्लंघन’’ करार दिया है. संपादकों के समूह ने मांग की कि इस आदेश को ‘‘तत्काल रद्द’’ किया जाए. हालाँकि, इस आलोचना का केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने जवाब देते हुए कहा है कि तीन नवंबर 2016 को सरकार के निर्णय के सार्वजनिक होने के एक दिन बाद ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने आयी जो स्पष्ट रूप से बिना बात विवाद पैदा करने की भावना से प्रेरित है.’’ Freedom of Speech, NDTV India Ban, Hindi Article, New, Modi Government, freedom vs free will, Changing Politics, Ravish Kumar Journalist, Social Media Reaction

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वेंकैया नायडू ने इस सम्बन्ध में जोर देकर कहा कि लोगों को जानना चाहिए कि 2005-14 के दौरान संप्रग सरकार ने 21 मामलों में कई टीवी चैनलों को बंद करने का आदेश दिया था. इसे लेकर केंद्रीय मंत्री ने उदाहरण भी दिया कि ‘एक दिन से दो महीने की समयावधि के दौरान ‘वयस्क’ प्रमाणपत्र वाली फिल्म दिखाये जाने वाले 13 मामले थे, जिसमें चैनलों को पूर्व में प्रतिबन्ध झेलना पड़ा था तो ‘एक स्टिंग ऑपरेशन दिखाने पर एक चैनल को 30 दिनों के लिए बंद कर दिया गया था.’ यह अच्छा है कि सरकार ने आलोचनाओं का जवाब देने की कोशिश की और पीड़ित चैनल के पास कोर्ट जाने का रास्ता भी खुला हुआ है. बावजूद उसके इस मुद्दे को लेकर जो सन्देश गया, वह ठीक नहीं. एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्डस समारोह में पुरस्कार वितरण के बाद कहा था कि ‘मीडिया के लिए विश्वसनीयता बनाए रखना एक बड़ा मुद्दा है’, तो भारत में आपातकाल का ज़िक्र भी पीएम ने किया और विश्वास दिलाया कि आपातकाल का दौर खत्म हो चुका है और ‘दिवंगत रामनाथ गोयनका और द इंडियन एक्सप्रेस’ की तरह लोग निडर होकर पत्रकारिता कर सकते हैं. बहुत संभव है कि इस मामले में सामान्य प्रक्रिया का ही पालन किया गया हो, पर इसका सन्देश तो कुछ अलग ही निकला है. सुबह इस मुद्दे पर लिखने बैठा तो मन में विचार आया कि इस पर सिर्फ अपने विचार ही लिखने के अपने आसपास का माहौल भांपने की कोशिश करनी चाहिए. फेसबुक पर कई साथियों से नरम-गरम चर्चा हुई और उसका लब्बोलुआब यही निकला की जिस ‘उरी आतंकी हमले’ में एनडीटीवी की रिपोर्टिंग को आधार बनाकर सरकार ने उस पर 1 दिन का बैन लगाने की घोषणा की है, उस तरह की या उस से मिलती जुलती रिपोर्टिंग लगभग सभी चैनलों ने की थी. यह बड़ा अजीब है कि संवेदनशील मामलों पर किस तरह की कवरेज की जाए, इस बारे में मीडिया अनजान और कई बार तो आपराधिक रुख अख्तियार करता है. यह किसी एक की बात नहीं है बल्कि सभी की ही बात है. हालिया मामले को छोड़ भी दें तो आपको ऐसे सैकड़ों मामले दिख जायेंगे कि इलेक्ट्रानिक मीडिया टीआरपी की दौड़ में इस कदर अंधा हो रहा है कि कई बार स्वतंत्रता की सीमा को लांघकर वह स्वच्छंदता की सीमा में पहुंच जाता है. Freedom of Speech, NDTV India Ban, Hindi Article, New, Modi Government, freedom vs free will, Changing Politics, Ravish Kumar Journalist, Social Media Reaction

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26 / 11 मुंबई अटैक में घटना की लाइव कवरेज की खूब निंदा हुई थी, किंतु आश्चर्य है कि ऐसे मुद्दों पर कोई ठोस एडवाइजरी सामने नहीं आई. अंदरखाने एडवाइजरी आयी भी होगी, किंतु तमाम संवेदनशील मुद्दों पर न केवल एनडीटीवी, बल्कि आज तक, ज़ी न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और दूसरे चैनल भी खूब गाल बजाते हैं. सरकार को अगर वाकई सेना की किसी रिपोर्टिंग पर कुछ गलत नजर आया था, तो उसे अपनी गाइडलाइन को मजबूत करना चाहिए और तमाम मीडिया समूहों से बातचीत भी करनी चाहिए. बजाय इसके सिर्फ एक चैनल एनडीटीवी को नोटिस थमा देने और 1 दिन का बैन लगाने से गलत रिपोर्टिंग का मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है और बात अब ‘आपातकाल’ की होने लगी है, जब मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया था! जाहिर तौर पर इस तरह के हालातों से सरकार को बचने की आवश्यकता है. फेसबुक पर ‘मीडिया की स्वतंत्रता और एनडीटीवी पर बैन के विरोध में लिखी’ मेरी पोस्ट में कुछ लोगों ने कमेंट किया कि मिथिलेश जी, अब आप भी बुद्धिजीवी/ सेकुलर बनने की कतार में हैं. उनके व्यंग्य को समझते हुए मैंने उनकी भाषा में जवाब दिया कि जनाब! राष्ट्रवादी पहले भी थे, आरएसएस पहले भी था, जनसंघ पहले भी था और भाजपा भी काफी दिनों से थी… तो सरकार में आने में इतना लंबा समय क्यों लग गया? आगे मैंने लिखा कि ‘बड़ी मुश्किल से सत्ता और लोगों का समर्थन मिला है, तो इसे #बपौती समझकर #जनतापार्टी की तरह समर्थन खोने की जरूरत नहीं है, बल्कि, जनता की भावनाओं का ख्याल करते हुए लंबी दूरी तय करने की जरूरत है. एक मित्र ने पोस्ट पर कमेंट किया कि-

“मुझे इस चैनल (एनडीटीवी) से नफरत 2013-14  में ही हो गई थी, जब ये लोग घोटालों में सवाल उठाने वालों से ही सवाल पूछने लगे थे। सरकार से सवाल पूछने की बात करने वाले यूपीए सरकार के पक्षकार बने हुए थे और हर हाल में उनको डिफेंड करते दिखते थे. उनका मकसद तत्कालीन मनमोहन सरकार से सवाल पूछना नहीं बल्कि बीजेपी से सवाल पूछना था, चाहे सरकार किसी की रही हो!” Freedom of Speech, NDTV India Ban, Hindi Article, New, Modi Government, freedom vs free will, Changing Politics, Ravish Kumar Journalist, Social Media Reaction, Emergency

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उन्होंने आगे लिखा कि ‘आज कुछ मिडिया घराने टारगेट बनाकर बैठे हुए हैं और उनका सर्जिकल नही हुआ तो नासूर बन जायेगा. आज सोशल मीडिया इन पर हावी है, जिसकी वजह से इनको अपना मुंह खुद काला करने की मजबूरी बन चुकी है. डरियेगा नही, ऑपरेशन जरूरी है.’ चूंकि सोशल मीडिया का ज़माना है और लोग कई-कई सालों के विडियो और ट्वीट ढूंढ लाते हैं और बहुत संभव है कि रविश की पत्रकारिता से ऊपर उद्धृत किये गए मित्र की तरह कई लोग नाराज हों, तो उनके लिए मैंने फेसबुक पर उत्तर दिया कि हर तरह की समस्याओं का ‘सर्जिकल केवल 5 साल में ही नहीं किया जा सकता. पहले यह सरकार 25 साल शासन करने और जनता का समर्थन तो बनाये रखे! फिर धीरे-धीरे करते रहो स्ट्राइक …. किसने रोका है? आगे मैंने हिंट दिया कि दिल्ली, बिहार के विधानसभा परिणामों को भी भाजपा समर्थकों को देखना चाहिए और उत्तर प्रदेश में भी कोई सर्वे अब तक भाजपा को बहुमत नहीं दे रहा है … … क्यों? साफ़ जाहिर है कि जनता की नब्ज़ समझनी ही पड़ेगी सरकार और उसके समर्थकों को, क्योंकि केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत सरकार बनने में मोदी की लोकप्रियता और संघ-भाजपा के संगठन का जितना हाथ था, उससे ज्यादा हाथ कांग्रेस के कुशासन का था. मतलब, इस सरकार को प्रतिक्रियास्वरूप बहुमत मिला है और अगर 2019 में भी यह सरकार बनी रह पाती है तो वह कुछ मुद्दों पर बेशक सर्जिकल स्ट्राइक करें, अन्यथा कहीं जनता ही सर्जिकल स्ट्राइक न कर दे! काफी लंबा हो गया लेख और कहने को और भी बहुत कुछ है, किन्तु कई बातें समझने को भी छोड़ देनी चाहिए … आप क्या कहते हैं?

मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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