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एक साथ चुनाव में आखिर दिक्कत क्या है?

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हमारे देश में राज्यसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की चर्चा सालों से होती रही है, किन्तु यह एक कदम भी आगे बढ़ी हो ऐसा कहीं से संकेत नहीं मिलता है. 2014 के आम चुनावों में भारी जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात के लिए प्रयासरत जरूर दिखते हैं कि एक साथ चुनाव कराने पर व्यापक चर्चा हो, क्योंकि बार-बार चुनाव कराये जाने से न केवल जनता के धन की बर्बादी (Election Reform in India) होती है, बल्कि आचार-संहिता लग जाने के कारण विकास-कार्यों में भी अनावश्यक रूकावट पैदा हो जाती है. इससे भी बड़ी चिंता होती है कि राज्यसभा और लोकसभा में निरंतरता के अभाव में तारतम्य नहीं बन पाता है, जिसकी तरफ पीएम ने इशारा भी किया है. इस क्रम में अगर हम आगे बात करते हैं तो हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई चुनाव आयोग के निमंत्रण पर ‘इंटरनेशन इलेक्शन विजिटर्स प्रोग्राम’ में शिरकत करते हुए भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने भारत में लोाकसभा और विधानसभा चुनाव को एकसाथ करवाने पर जोर दिया है. हालाँकि, इसके लिए सभी राजनीतिक दलों का एकमत होने के साथ साथ संवैधानिक संशोधन भी जरुरी है. यदि देखा जाय तो सुधार की दृष्टि से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होना बहुत ही महत्वपूर्ण है. अत्यधिक संख्या में चुनाव होने से चुनाव को जीतने के लिए आज कल के चालाक नेता कल, बल और छल का उपयोग करते हैं, जिससे चुनाव अपने आप में एक अनावश्यक-इंडस्ट्री के रूप में तब्दील हो चुकी है.

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बार-बार चुनाव होने से राजनेता से लेकर आम आदमी तक सारे अपनी अपनी भागीदारी निभाने के लिए अपना पूरा ध्यान इसी तरफ लगा देते हैं, तो सरकारी कर्मचारी अपना काम छोड़ इसमें लग जाते हैं, जिससे स्कूल और दुसरे सरकारी संस्थानों का कार्य भी समय-समय पर बाधित होता रहता है. जाहिर है, अगर चुनाव एकसाथ होते हैं तो समय और पैसा बचने के साथ चुनाव आयोग को भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में भी कम ही परेशानी होगी! चुनावों में काला धन का मुद्दा आखिर किसे पता नहीं है और यह इतनी बड़ी मात्रा में झोंका जाता है कि टाटा और रिलायंस जैसी कंपनियों की कुल पूँजी भी इसके सामने कम पड़ जाए! हमारे पीएम कहते रहे हैं कि लोकतंत्र में चुनाव ‘बाई-प्रोडक्ट’ (Election Reform in India) होने चाहिए, किन्तु दुर्भाग्य से यही मुख्य खेल बन गया है, बजाय कि प्रशासन पर लोगों का ध्यान रहता! ऐसे में एक साथ चुनाव कराने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन हो तो अच्छा सन्देश जाता, किन्तु यह नामुमकिन सा ही दिखता है. आखिर, जीएसटी जैसी सर्वसम्मति के बिल को पिछले कई साल से लटकाया जा रहा है. जब भाजपा विपक्ष में थी, तब उसने इसका विरोध किया और अब जब उसे सत्ता में दो साल से ज्यादा हो चुके हैं तब कांग्रेस अपनी बन्दूक ताने हुए है. साफ़ है कि आज पार्टियों की जनहित के मुद्दों पर सहमति कम और विरोध ज्यादा है, कई बार तो अनर्गल! हालांकि, संसद की एक स्थाई समिति द्वारा इसके लिए पैरवी की गई थी, पर नतीजा सबके सामने है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीतिक दलों को इस तरह के मुद्दे पर गहराई से विचार-विमर्श करने की जरूरत हैं.

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वर्तमान सत्ताधारी यानि भारतीय जनता पार्टी तो इसके लिए तैयार है लेकिन विपक्षी इसको व्यावहारिक नहीं मानते हुए ख़ारिज कर चुके हैं. ऐसे में राजनीतिक दलों का व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ राष्ट्रहित के ऊपर भारी होता दिखलाई दे रहा है. इस क्रम में अगर हम थोड़ी डिटेल में बात करें तो, लोकसभा और विधानसभा के चुनाव को एक साथ कराने के लिए पहले भी विचार हो चुका है. इसके लिए विधि आयोग द्वारा 1999 में सरकार को अपनी एक रिपोर्ट भेजी गयी थी. भाजपा के दिग्गज नेता रहे लालकृष्ण आडवाणी ने भी बहुत पहले सभी चुनावों को एकसाथ कराने का विचार (Election Reform in India) पेश किया था. संयोगवश ही सही, पर देखा जाय तो 1951 और 1952 में पहले आम चुनाव और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए थे, जो 1964 तक चलता रहा. लेकिन 1968 और 1969 में कुछ  विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर दिए जाने के बाद यह प्रक्रिया रुक सी गई. हालाँकि, इस प्रक्रिया को लागू करने में कई पेचीदगियां भी हैं, जैसे अगर बीच में किसी राज्य की सरकार गिर जाती है या उसे भंग किया जाता है तो उसमें कितने महीने तक राष्ट्रपति शासन लगा रह सकता है? इसके अतिरिक्त, बात सिर्फ लोकसभा और विधानसभा चुनावों की ही नहीं है, बल्कि ग्राम-पंचायत, नगर-पंचायत और तमाम अप्रत्यक्ष चुनाव भी इस श्रेणी में हैं.

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ऐसे में 5 साल में 1 बार नहीं, बल्कि ढाई-ढाई साल के दो स्लॉट बनाये जाएँ और फिर इसी पैटर्न पर सभी चुनाव कराये जाएँ. मतलब देश में जो भी चुनाव होंगे, वह इन्हीं दो निश्चित समयों पर होंगे. थोड़ा और स्पष्ट करूँ तो इसे यूं समझिए कि अगर 2019 की जनवरी में लोकसभा चुनाव और तमाम विधानसभा चुनावों को एक साथ कराया जाता है और 2020 में किसी एक राज्य की सरकार गिर जाती है अथवा उसे राष्ट्रपति द्वारा बर्खास्त कर दिया जाता है तो बाकी बच्चे डेढ़ साल में उसे राष्ट्रपति शासन (Election Reform in India) के अंतर्गत रहना होगा (या फिर इस डेढ़ साल की अवधि में राजनीतिक दल सरकार भी बना सकते हैं) और फिर 2021 के मध्य में यानि जून-जुलाई में जो चुनाव होगा, उसमें फिर उस राज्य का चुनाव-संपन्न होगा. ऐसे ही देश भर के चुनावों को एक पैटर्न पर लाना होगा. हालाँकि, इसका गहन अध्ययन करने वाली समिति की सिफारिशों में, राजनीतिक दलों के इंकार-इकरार करने के कारणों में स्पष्टता की भारी कमी है और जब तक देशव्यापी चर्चा नहीं होगी इस मुद्दे पर तब तक भारत में ढेरों चुनावों का बोझ जनता की कमर तोड़ता रहेगा, इस बात में दो राय नहीं!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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