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आखिर, कब तक सहें नक्सली हिंसा!

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भारतवर्ष की बड़ी समस्याओं में नक्सली हिंसा का स्थान सबसे ऊपर की पंक्ति में दर्ज है, और इसमें बड़ी मुश्किल तो यह है कि लगभग तीन दशक के भारी खून-खराबे के बावजूद न तो सरकारें और न ही समाज किसी हल के नजदीक पहुँच पाया है. कभी इधर का तो कभी उधर का बस खून ही तो बह रहा है. कहते हैं कि जब तक किसी समस्या का राजनीतिकरण नहीं हुआ होता है, तब तक उसके हल की गुंजाइश जरूर दिखती है, किन्तु ज्योंही कोई समस्या राजनीति की दलदल में फंसी, उसके बाद वह समस्या चिरकाल तक समस्या बनी रहने के लिए अभिशप्त हो जाती है. आज बड़ा आसान है एकतरफा बयान जारी करना और कह देना कि नक्सली समस्या को ऐसे सुलझाएं, वैसे सुलझाएं, किन्तु सच तो यह है कि समस्या सुलझाने वाले कई बार नक्सलियों का अपने हितों के लिए इस्तेमाल करने में चूकते नहीं हैं! न केवल राजनीति, बल्कि तमाम एनजीओ से लेकर धार्मिक संस्थानों तक पर नक्सलियों को भड़काने, उनका इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं. मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद तमाम एनजीओ की फंडिंग क्या रुकी, देश से लेकर विदेश तक में शोर मच गया. पिछली साल आरएसएस के नेता इंद्रेश कुमार ने नक्सलाइट को लेकर एक बड़ा बयान दिया था, जिस पर जबरदस्त हलचल मची, हालाँकि किसी ने उनके बयान की शिनाख्त करने की कोशिश नहीं की. भई! सीधी सी बात है कि अगर किसी का बयान गलत है तो उसकी बड़े स्तर पर भर्त्स्ना करो और अगर उसमें रत्ती भर भी सच्चाई है तो निश्चित रूप से उसकी जांच-पड़ताल करने की आवश्यकता है. तब के बयान में, वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के लिए चर्चों और ईसाइयों से अहम भूमिका निभाने का आह्वान करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने आश्चर्य से कहा कि क्यों नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में कभी भी ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय को ‘‘निशाना नहीं बनाया.’’

पहली नज़र में इस नेता का बयान थोड़ा नकारात्मक प्रतीत हो सकता है, किन्तु सोचा जाना चाहिए कि क्या वाकई में यह इतना ज्यादा नकारात्मक है? इस बात में भला क्या शक है कि ‘‘विकास सिर्फ शांति एवं भाईचारे के जरिए ही हासिल किया जा सकता है, हिंसा के जरिए नहीं. इतनी सरल सी बात समझने और समझाने के लिए आखिर कौन सा खुदाई ग्रन्थ ज़मीन पर उतारना पड़ेगा! इंद्रेश कुमार ने अपने बयान में आगे स्पष्ट किया था कि ‘‘नक्सलियों ने कभी भी चर्चों को निशाना नहीं बनाया, इसलिए कि वे उनकी सेवा करते हैं या कोई अन्य कारण है?’’ तब उस कार्यक्रम का आयोजन दक्षिणी छत्तीसगढ़ में मौजूद वामपंथी उग्रवाद की समस्या पर विचार करने के लिए फोरम फॉर अवेयरनेस ऑफ नेशनल सिक्यूरिटी (फैन्स)’’ ने किया था. इस बात में किसी प्रकार का शक नहीं है कि नक्सलियों को हथियार और भारी मात्रा में विदेशी धन की आपूर्ति की जाती रही है, जिस पर तमाम सेक्यूलर, बुद्धिजीवियों की जुबान को ताला लग जाता है. जेएनयू समेत अन्य तमाम मुद्दों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वालों को इस बात का जवाब देना ही चाहिए कि मार्च 2016 के आखिर में, छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा सीआरपीएफ के 7 जवानों की मौत का गवाह क्यों बना? दर्जनों जवान घायल होकर अस्पताल में कराह रहे हैं तो उन नक्सलियों और उनके समर्थकों को आखिर कौन सी आज़ादी मिल गयी है या उसके मिलने की सम्भावना बढ़ गयी है. सच तो यही है कि देश और विदेश के तमाम लोग अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को परवान चढाने के लिए इन नक्सलियों का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं तो कई नक्सली भोले भाले लोगों को अपना हथियार बनाने में ज़रा भी हिचक नहीं रहे हैं. आरएसएस नेता ने तब के अपने बयान में बेहद साफगोई से कहा था कि ‘‘..सरकार, समाज और मीडिया के लोग क्षेत्र में अवैध गतिविधियां होने के संबंध में सूचना प्रदान करते हैं. ऐसे में क्या चर्चों ने मीडिया या सरकार को क्षेत्र में इस प्रकार की हिंसक एवं गैरकानूनी गतिविधियों की कभी कोई सूचना दी है?’’ जाहिर है, यह एक बड़ा सवाल उन्होंने खड़ा किया, जिसका जवाब ढूँढ़ने की ज़हमत नहीं उठायी गए थी. हालाँकि बैलेंस करते हुए उन्होंने तब स्पष्ट किया था कि वह चर्चों की ईमानदारी पर सवाल नहीं कर रहे हैं! लेकिन प्रश्न यही है कि नक्सलवाद समाप्त करने में चर्चों से सक्रिय भूमिका की अपेक्षा आखिर क्योंकर नहीं की जानी चाहिए?

इस कड़ी में, नक्सली जाल में फंसे लोगों को निष्पक्ष होकर अब फैसला करना चाहिए कि क्या नक्सली आंदोलन से क्षेत्र को जीवन मिला है? या मिली है सिर्फ मौत! इस हिंसक आंदोलन से शिक्षित लोग मिले या उनसे साक्षरता छीन ली गई है? लोगों और जवानों को मारने से बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित हुआ है या स्वास्थ्य सुविधाएं नष्ट हो गईं हैं? आखिर प्रश्न क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि इस तरह की दिशाहीन हिंसा से विकास को बढ़ावा मिला है अथवा प्रगति-पथ पर ही कुठाराघात हुआ है? अगर हाल की नक्सली घटना का ज़िक्र किया जाय तो “सीआरपीएफ की 230 बटालियन के जवान दंतेवाड़ा से 12 किलोमीटर दूर मेलावाड़ा से लगे हुये इलाक़े में सर्च ऑपरेशन के बाद लौट रहे थे, जहां वे पहले से माओवादियों द्वारा लगाये गये बारुदी सुरंग की चपेट में आ गए.” प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार विस्फोट इतना भयंकर था कि गाड़ी के परखच्चे उड़ गए. मुख्यमंत्री रमन सिंह ने हमले की निंदा करते हुए कहा है कि माओवादियों की इस हरकत का जवाब दिया जायेगा. पर प्रश्न वहीं आकर अंटक जाता है कि एक-दुसरे को जवाब या तो ठीक से दिया जाय और अगर नहीं तो राजनीति से परे हटकर सभी राजनीतिक दलों और चर्च इत्यादि संगठनों को इन सभी नक्सलियों के आत्मसमर्पण की दिशा में कंधे से कन्धा मिलाकर कार्य करना ही होगा! भारत जैसे सुन्दर और विविधतापूर्ण देश में नक्सली हिंसा किसी खूबसूरत चेहरे पर कैंसर की तरह उभर रहा है, इस बात में किसी को रत्ती भर भी शक नहीं होना चाहिए. शुरुआत के स्टेज में यह ‘नक्सलियों के आत्मसमर्पण या फिर उनके नरक भेजने की कड़ी व्यवस्था’ नामक कीमोथेरेपी से शायद ठीक हो जाए, अन्यथा कैंसर का अंत हम सबको ही मालूम है! निश्चित रूप से किसी भी व्यक्ति या संगठन को गैर-संवैधानिक लड़ाई के प्रति सहानुभूति रखने वालों से कड़ाई से निपटा जाना चाहिए! हाँ, इस बीच इस समस्या को जरूर सुलझाया जाना चाहिए, वह भी राजनीति के वगैर कि आखिर नक्सली लगातार, भोले-भाले ग्रामीणों, आदिवासियों की सहानुभूति किस प्रकार प्राप्त कर पाने में सफल हो रहे हैं!

आखिर यह समस्या क्षेत्र विशेष तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी भयावहता का अंदाजा लगाने में कई बार आपका पसीना बहना बंद ही नहीं होगा. एक अपुष्ट आंकड़े के अनुसार नक्सलवाद देश के 20 राज्यों के 220 जिलों से अधिक में फैल चुका है तो अब तक इसके कारण 20 हजार से ज्यादा लोग हताहत हुए हैं. एक और जानकारी के मुताबिक देश में 20,000 से ज्यादा ट्रेंड नक्सली काम कर रहे हैं, जिसमें लगभग 10,000 सशस्त्र नक्सली कैडर बुरी तरह प्रेरित और प्रशिक्षित हैं. जाहिर है यह सेना के एक बटालियन की तरह ही कार्य करती है, जबकि इनका उद्देश्य विदेशी शक्तियों से प्रेरित रहा है. इसी कड़ी में देखा जाय तो आज देश में लगभग 56 नक्सल गुट मौजूद हैं तो करीब 40 हजार वर्ग किलोमीटर इलाका नक्सलियों के कब्जे में हैं. इनकी अर्थव्यवस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नक्सली करीब 1400 करोड़ रुपए हर साल रंगदारी के जरिए वसूलते हैं तो भारतीय राज्य को सशस्त्र विद्रोह के जरिए वर्ष 2050 तक उखाड़ फेंकने का लक्ष्य इनको इनके आकाओं द्वारा दिया गया है. जाहिर है, यह समस्या ऊपर से जितनी छिटपुट दिखाई जाती है, भीतर से उतनी ही गम्भीर है और वगैर इसका बहुकोणीय हल ढूंढें देश में आंतरिक शांति कायम करना दिवास्वप्न ही है, तो इसके साथ-साथ अच्छे दिन का सपना भी दिवास्वप्न साबित हो सकता है, इस बात में रत्ती भर भी सुबह नहीं!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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