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बहुत देर कर दी हुज़ूर …

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राहुल गांधी के लोकसभा दिए गए धारदार भाषण को देखकर यही कहना पड़ रहा है कि ‘बहुत देर कर दी हुज़ूर’… देखा जाए तो, लोकतंत्र की सफलता के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण बातें होती हैं, उनमें विपक्ष का रोल निश्चित रूप से बेहद महत्वपूर्ण होता है. सरकार किस रास्ते पर जा रही है, उसको टोकने का नैतिक अधिकार विपक्ष का ही होता है और अगर विपक्ष यह कार्य ठीक ढंग से नहीं कर रहा हो तो फिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था चरमराने लगती है. जनता नाराज है कि खुश है, सरकारी योजनाएं ठीक ढंग से क्रियान्वित हो रही हैं अथवा नहीं हो रही हैं और इन सबसे बढ़कर सरकार और पूरा प्रशासन जवाबदेही से कार्य कर रहा है कि नहीं, इस बात को चेक करने की जिम्मेदारी विपक्ष की ही तो है. दुर्भाग्य से भारत में विपक्ष का रोल कई बार संतोषजनक नहीं रहा है और इसका परिणाम यह होता है कि सरकार अपने ढर्रे पर चलती जाती है, वगैर किसी ठोस जवाबदेही के! ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि विपक्ष को विरोध करने आता ही नहीं है, बल्कि वह विरोध करना खूब जानता है, लेकिन बजाय कि जनता के मुद्दों पर विरोध करे, वह संकीर्ण राजनीति को लेकर सरकार को घेरने की असफल कोशिश करता है, और जनता के मुद्दे कहीं दूर छूट जाते हैं.

नरेंद्र मोदी सरकार के पूर्ण बहुमत में सत्ता पर विराजमान होने के बाद शायद पहली बार विपक्ष से राहुल गांधी ने सरकार पर ‘टू दी पॉइंट’ हमला बोला, जिसे कई लोगों ने सकारात्मक विपक्ष का रूप क्या होता है, यह देखा और सराहा भी! राहुल गांधी ने सरकारी नीतियों की जमकर बखिया उधेड़ी तो केंद्र सरकार में आने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उनके चुनावी वादों की याद बखूबी दिलाई. बोलने में सहजता लाते हुए राहुल गांधी को देखकर ऐसा प्रतीत हुआ, मानो उनमें भी कहीं न कहीं गूढ़ नेता बनने की प्रतिभा छुपी हुई थी, अन्यथा अब से पहले तो लोग उन्हें ‘पप्पू’, युवराज और जाने क्या-क्या कहते रहे थे. हालाँकि, जिस सकारात्मक ढंग से राहुल गांधी संसद में पेश आये हैं, उन्हें अपने तेवर और अपनी तैयारी आगे भी दिखानी होगी, अन्यथा जनता उनकी छवि को गंभीरता से लेने की बजाय  पहले की तरह मजाक में ही लेगी, जो कांग्रेस पार्टी तो कतई नहीं चाहेगी. देखा जाय तो अगर विपक्ष ठीक ढंग से कार्य करे तो कोई कारण नहीं है कि सरकार गलत रास्ते पर चलने का जरा भी साहस जुटा सके और यही कार्य संसद में राहुल गांधी ने भी किया. अपने भाषण में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में सरकार पर जमकर निशाना साधते हुए काले धन से लेकर, रोज़गार, रोहित वेमुला और जेएनयू तक के मुद्दों पर बोला. उनके भाषण में तंज, व्यंग और हास्य के साथ मजे हुए नेता का अंदाज नज़र आया, जो इससे पहले शायद ही देखा गया हो!

वर्तमान मुद्दों को छेड़ते हुए राहुल ने कहा कि नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए थे तो बड़े बड़े वादे किए थे, लेकिन रोज़गार, महंगाई की स्थिति जस की तस है. दाल 200 रुपये तक पहुंच गई, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दाम लुढ़कने के बाद जो बचत हुई, उसका एक पैसा जनता को नहीं मिला, मिला तो उद्योगपतियों को. इस क्रम में हमले की धार को तेज करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष ने सरकार के मेक इन इंडिया के लोगो को काले रंग के ‘बब्बर शेर’ का बताते हुए पूछा कि इससे रोज़गार कितना उत्पन्न हुआ? आगे भी दिलचस्प हमला करते हुए राहुल गांधी कहा कि सरकार बजट में ‘फ़ेयर एंड लवली स्कीम’ लेकर आई है ताकि लोग अपने काले धन को सफेद बना सकें. सरकार ने पहले कालाधन वापस लाने का वादा किया, अब उसे ही सफ़ेद करने की स्कीम बना दी. जाहिर तौर पर यह तंज अरुण जेटली की ओर था, जिन्होंने बजट में काले धन को लेकर विशेष प्रावधान किये हैं. यही नहीं, राहुल ने संघ पर भी निशाना साधा. जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की क़ीमतों का वह हवाला दे रहे थे तो उन्हें मौजूदा दामों पर टोका गया. इस टोका टाकी पर उन्होंने सधे अंदाज में कहा कि, “मैं आरएसएस से नहीं हूँ, मैं ग़लतियां करता हूं. आप लोगों को सबकुछ पता होता है. हम लोग अपनी ग़लतियों से सीखते हैं.” जाहिर तौर पर यह इशारा कहीं न कहीं उन तथाकथित अतिवादियों की ओर था, जो कभी राष्ट्रद्रोह तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर सोशल मीडिया से लेकर दूसरी जगहों पर, खुद को परफेक्ट बताते हुए, हंगामा खड़ा करने लगते हैं. रोहित वेमुला पर सवाल उठाते हुए राहुल ने पूछा कि क्या उसके जैसे ग़रीब बच्चों को पढ़ने का हक नहीं है? रोहित की ही तरह जेएनयू में 60 प्रतिशत स्टूडेंट आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक है, 40 प्रतिशत स्टूडेंट्स के परिजनों की आमदनी 6000 रुपये प्रतिमाह है. क्या या हंगामा इसलिए हो रहा है क्योंकि ‘वे’ लोग ग़रीबों को शिक्षा से वंचित कर देना चाहते हैं!

सरकार को चेतावनी देते हुए राहुल ने कहा कि ‘आप न तो जेएनयू को कुचल पाओगे न गरीब लोगों को’. राहुल के इस भाषण पर कांग्रेसियों सहित दुसरे सदस्यों ने भी मेजें थपथपाएं, जिससे उत्साहित होकर यूपीए की मनरेगा का ज़िक्र करते हुए राहुल ने कहा कि ‘जिस मनरेगा को प्रधानमंत्री ने यूपीए की असफलताओं का स्मारक कहा था, अब उसी की बड़ाई हो रही है. ‘ राष्ट्रवाद पर चल रही बहस पर भी राहुल ने बोला और साफ़ कहा कि राष्ट्र केवल तिरंगा नहीं है, वो देश की विविधता और बहुलता का प्रतिनिधित्व करता है, और हम तिरंगे को सलाम करते हुए उस विविधता और बहुलता को सलाम कर रहे होते हैं, जिसका वो झंडा प्रतिनिधित्व करता है. एक राष्ट्र इसके लोगों के बीच का रिश्ता होता है और अगर लोगों के बीच बातचीत को रोक देंगे तो राष्ट्र मर जाएगा. उनके भाषण के अर्थ और निहितार्थ अपनी जगह हैं, किन्तु  कुल मिलाकर राहुल गांधी ने विपक्ष के नेता का रोल सही ढंग से निभाया और यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में सरकार विपक्ष के सधे हमलों का जवाब किस प्रकार देती है. राहुल गांधी से भी जनता की उम्मीदें थोड़ी ही सहीं, इस भाषण से जरूर बढ़ी होंगी, इस बात में दो राय नहीं है. उम्मीद इस बात की भी जगी है कि नकारात्मक राजनीति की राह छोड़कर संसद को चलने दिया जा रहा है, जो आगे भी जारी रहेगा ताकि जरूरी बिल पास किये जा सकें! जनता अब हर एक लोकसभा बहस को देखती है, समझती है और सोशल मीडिया पर उसके ऊपर चर्चा भी करती है, वह बहस या भाषण चाहे स्मृति ईरानी का हो अथवा राहुल गांधी का हो, बस नेता उसमें जनता के हितों की बात करें और सकारात्मक राजनीति का दामन न छोड़ें.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
March 8, 2016

बाद में तो सबने यही ककर खिल्ली उड़ा दी की उम्र बढ़ने से समझ नहीं बढ़ती. अब देखिये आगे क्या होता है. कम से कम पी ऍफ़ वाला ही वापस ले ले सरकार बाकी तो जो करना चाहे कर ही रही है. विपक्ष की कमजोरी का फायदा सरकारें उठती रही हैं आज भी सारा दोष विपक्ष पर मढ़कर ही काम चलाये जा रहे हैं. पत्रकार को निरपेक्ष होना ही चाहिए.

Jitendra Mathur के द्वारा
March 8, 2016

पत्रकार को निरपेक्ष होना ही चाहिए । ठीक कहा है जवाहर जी ने । आपका लेख तर्कसम्मत है । सुदृढ़ एवं सार्थक लोकतन्त्र के लिए उपयुक्त विपक्ष का होना भी आवश्यक है ताकि सत्ता निरंकुश न हो जाए ।


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