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बहता नीर है धर्म, रूढ़िवादिता है अंत

Posted On: 16 Sep, 2015 Others,Politics,Religious में

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Hindi article on religion and changing nature by Mithilesh, a r rahman issueकहा जाता है कि रूका हुआ पानी सड़ने लगता है और ऐसी ही स्थिति धर्म की भी है. और जब धर्म सड़ांध मारने लगता है तो उससे न केवल बदबू फैलती है, बल्कि कट्टरपंथ और सम्प्रदायवाद जैसा रोग भी फैलता है. ऐसी धर्मान्धता के नाम पर मानवता ने क्या कुछ नहीं खोया है. कहा तो यही जाता है कि तमाम अत्याचार, क्रूर व्यवहार धर्म की रक्षा के लिए तथाकथित ‘ठेकेदारों’ द्वारा किया जाता है, किन्तु सच्चाई यही है कि धर्म की आड़ में ऐसे इंसान या समूह अपना व्यक्तिगत स्वार्थ, कुंठा, असफलता और हिंसक मानसिकता को ही तुष्ट करने का बदनाम प्रयास करते हैं. अति तो तब हो जाती है, जब इस प्रकार के अति महत्वाकांक्षी और अपने कुकृत्यों को ही सही मानने वाले लोग, धर्म की आड़ लेकर कला और संगीत को भी अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं और अगर उनका कोई विरोध करे तो उसे कुचलने में वह ज़रा भी संकोच नहीं करते हैं. ताजा मामला, अकेडमी अवार्ड विजेता मशहूर संगीतकार ए.आर.रहमान का है. ए.आर. रहमान पर पैग़ंबर मोहम्मद पर बनी फ़िल्म में संगीत देने के कारण उन पर कट्टरपंथी सवाल उठा रहे हैं. मुसलमानों की मुंबई स्थित एक संस्था ने इस फ़िल्म के संदर्भ में उनकी कड़ी आलोचना की है और फ़िल्म पर प्रतिबंध की मांग करते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखाHindi article on religion and changing nature by Mithilesh, Osama Bin Laden है. यह संस्था यहीं नहीं रुकी, बल्कि वह यह भी मानती है कि इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक, संगीतकार रहमान और इस फ़िल्म में काम करने वाले दूसरे लोगों से ग़लती हुई है और उन्हें माफ़ी मांगनी चाहिए. गौरतलब है कि ईरान के माजिद मजीदी द्वारा निर्देशित यह फिल्म ईरान में बनी अब तक की सबसे मंहगी फ़िल्म है, जिसको बनाने में चार करोड़ अमरीकी डॉलर से ज्यादा ख़र्च हुए हैं. अब भला कुछ लोगों और संस्थाओं की यह ग़लतफ़हमी कैसे दूर हो कि किसी धर्म के ठेकेदार बनने का हक़ उन्हें नहीं है और यही बात ए.आर.रहमान ने भी अपनी भावुक अपील में भी कही. विवाद का जवाब देते हुए रहमान ने अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर लिखा कि “मैं इस्लाम का विद्वान नहीं हूं और मैं पश्चिम और पूर्वी संस्कृति दोनों को जीता हूं और सभी लोगों को जैसे वो हैं, वैसे ही प्यार करता हूं.” रहमान ने जिस ढंग से अपनी सफाई में स्पष्ट भाव का विनम्र परिचय दिया है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है. उनके जैसे महान कलाकार का मानवता के नाम एकता का सन्देश भी गौर करने लायक है. उन्होंने आगे यह भी कहा कि मैंने एक ऐसी फ़िल्म में संगीत दिया है, जिसका मक़सद मानव जाति में एकता पैदा करना, ग़लत धारणाओं को दूर करना, अल्लाह के नाम पर बेगुनाहों की हत्या करने के बजाए ग़रीबों के जीवन को बेहतर करना और मानवता की सेवा करने के ईश्वरीय संदेश को फैलाना है.” हालाँकि, रहमान का सोशल मीडिया के तमाम यूजर्स ने खुलकर सपोर्ट किया है और साफ़ कहा है कि भारत जैसे आज़ाद देश में किस फिल्म में संगीत देना है, किस फिल्म में नहीं, इस बात का ए.आर.रहमान को पूरा अधिकार है. मगर यही बात अगर देश में बात-बेबात पर लड़ाई कराने वाले समझ जाएँ तो इंसानियत का भी भला हो जाएगा, मगर यह बात इनको समझ आएगी, यह दूर की कौड़ी दिखती है. कई विद्वानों का यह भी मानना है कि अगर इस्लाम में कट्टरपंथ का सर्वाधिक ज़ोर है तो उसके पीछे एकमात्र कारण यही है कि ‘बहते नीर’ की बजाय इस्लाम को ऐसी संस्थाओं और कट्टरवादी व्यक्तियों द्वारा ‘जड़’ बना दिया गया है. सीधी बात है कि कुरान में चाहे जो कहा गया हो, लेकिन आम मुसलमानों को ज़िंदा तस्वीरें चाहिए, जिससे वह प्रेरणा ले सकें. चूँकि, बुद्धिजीवी इस तरह की कोई शुरुआत नहीं करते हैं, इसलिए ओसामा बिन लादेन, बगदादी जैसे खलीफा अपने आप ही पैदा हो जाते हैं और पूरे विश्व के देशों से मुसलमान उनसे न केवल सहानुभूति रखते हैं, बल्कि अनेक विकसित देशों से युवा आईएस और अल-कायदा जैसे संगठनों में शामिल भी हो रहे हैं. चूँकि, अल्लाह का कोई ‘ए.आर.रहमान’ जैसा प्रतिनिधि नहीं है संसार में, या उसे नहीं बनने दिया जाता है, इसलिए ‘बगदादी’ जैसे लोग अपने आप ही उस ‘ईश्वरीय गैप’ को भर देते हैं. आखिर, रहमान जैसा व्यक्ति, मुसलमानों के लिए किसी ‘पैगम्बर’ का दर्जा क्यों नहीं पा सकता है? इस बात पर इस्लाम-जगत को खुद ही विचार करना चाहिए. हाँ! अगर इसमें ‘कुरान या हदीस’ की कोई बाधा आती हो तो एक प्रसंग का ज़िक्र करना चाहूंगा. भारत में जब ‘बौद्ध धर्म’ का प्रचलन ज़ोरों पर था, तो हिन्दू  धर्माचार्यों को बड़ी चिंता हुई कि अगर बौद्ध धर्म ऐसे ही बढ़ता रहा तो सनातनियों के सामने बड़ी मुश्किल हो जाएगी. विचार-विमर्श के बाद तत्कालीन पंडितों, विद्वानों ने महात्मा बुद्ध को भगवान काHindi article on religion and changing nature by Mithilesh, Mahatma buddh and Hindus दशम अवतार घोषित कर दिया. अब क्या था, उनके सिद्धांतों को भी हिन्दू धर्म ने खुद में समाहित करके खुद को प्रवाहमान बना लिया. ऐसे ही ‘बुद्धिमत्तापूर्वक निर्णयों’ का ही परिणाम है कि आज विश्व का सबसे पुराना धर्म प्रगति के पथ पर अग्रसर है. सिर्फ महात्मा बुद्ध का प्रकरण ही क्यों, जब भारत में इस्लाम का उभार अपने चरम पर था, तो हिन्दुओं ने स्वाभाविक रूप से सूफी-मज़ारों को भी अपना लिया. हिन्दुओं का यह निर्णय आज भी जारी है, जिससे साबित होता है कि डर के कारण यह निर्णय नहीं था, बल्कि धर्म के ‘बहते नीर’ स्वभाव के अनुरूप था. विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन ‘आरएसएस’ के बारे में बहुत सारी नकारात्मक बातें उसके आलोचकों द्वारा कही जाती हैं, लेकिन उसके प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान की ओर देखना चाहिए जो ‘धर्म के बहते नीर स्वभाव’ के अनुरूप ही है. आरएसएस के सरसंघचालक ने अपने एक बयान में कहा कि “हमें अपने धर्म की बातों का साइंटिफिक एंगल भी देखना चाहिए. जो बातें वैज्ञानिक कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं उन्हें छोड़ देना चाहिए. भारतीय समाज में परंपरा रही है कि हम गलत चीजों को छोड़ देते हैं जबकि दुनियाभर की अच्छी बातों को अपनाते हैं. सभी मुद्दों और Hindi article on religion and changing nature by Mithilesh, Mohan Bhagwat, RSSपरेशानियों को हिंदू फिलॉसफी के जरिए वैज्ञानिक ढंग से समझा जाना चाहिए. अब आरएसएस की आलोचना करने वाले बताएं कि पूरे विश्व में इस्लाम धर्म में ऐसा कोई संगठन और उसका शीर्ष नेता ऐसा बयान दे सकता है क्या कि ‘इस्लाम में जो मान्यताएं, विज्ञान के अनुरूप नहीं हैं, उन्हें छोड़ कर नयी परम्पराएं बनाई जानी चाहिए’. चाहे लाख बुराई करे कोई किसी की मगर, उससे अच्छी बातें सीखने में क्या बुराई है? रूढ़िवादिता पर ज़ोर देने वालों को सोचना चाहिए कि सृष्टि में जब सब कुछ बदल चूका है तो धार्मिक मान्यताएं बदलने में संकोच क्यों? और बदलाव के प्रतीक ए.आर.रहमान जैसे ध्वजवाहकों का विरोध क्यों? सोचिये, सोचिये … तब निर्णय लीजिये! आखिर, धर्म इंसानी रूप में बनाये गए नियम ही तो हैं, जो इंसानों के लिए ही बनाये गए हैं. बेहतरी के लिए, विकास के लिए, उन्नति के लिए, दुखों से मुक्ति के लिए, कर्तव्यों के निर्वहन के लिए… और इन सबके लिए आवशयक है ‘परिवर्तन’! यही संसार का नियम है!

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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