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प्याज का दायरा

Posted On: 23 Aug, 2015 Others,Recipe,Politics में

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यह बात यकीन के साथ कही जा सकती है कि प्याज के मामले में तमाम लोगों के अलग अलग अनुभव रहे होंगे. क्या आम क्या ख़ास, इस प्याज ने कइयों को उलझा रखा है तो Price of onion, pyaj, hindi articleविभिन्न कारणों से कइयों की नाक में भी दम कर रखा है. प्याज से जुड़ा मेरा अनुभव भी है, जिसे लिखते वक्त मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इसे साहित्य की कौन सी विधा में शामिल किया जा सकता है. खैर, यह मेरी व्यक्तिगत समस्या है लेकिन उनका क्या करूँ, जिनको मैं प्याज देने का वादा कर चुका हूँ. दिल्ली के उत्तम नगर क्षेत्र में एक ट्रैक्टर पर ‘देशी प्याज’ बेचने बिल्कुल सुबह-सुबह दो बन्दे आ धमकते थे. देशी प्याज के फायदे, उसके गुणों का बखान करता हुआ उनके ट्रैक्टर पर तेज आवाज में लॉउडस्पीकर बजता था और चूँकि वह बाजार भाव से 10 रूपये कम तक लगाता था तो उसके ट्रैक्टर पर भीड़ लगी रहती थी. श्रीमतीजी की कई दिन की लगातार टोकाटाकी के बाद, अपनी नींद में खलल डालकर मैं भी पांच किलो एक साथ ले आता था, हालाँकि वह रोज या एक दिन छोड़कर आ ही जाता था, मगर रोज अपनी सुबह की प्यारी नींद कौन ख़राब करे? इधर कब प्याज की कीमत आसमान छूने लगी, इसे देखते हुए भी मेरे अवचेतन मन में वह देशी प्याज वाला कहीं बना हुआ था, जिसका अहसास मुझे तब हुआ जब एक न्यून सक्रीय राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष ने मुलाकात में मुझसे कहा कि यार मिथिलेश, प्याज का रेट आसमान छू रहा है. मेरे मुंह से तत्काल मेरे मोहल्ले के देसी प्याज वाली बात निकल गयी कि मेरे यहाँ तो 100 रूपये की पांच किलो है. बस अध्यक्ष महोदय ने तत्काल 100 का नोट हाथ में पकड़ाते हुए बनावटी कातर स्वर में बोले, यार 5 किलो मेरे लिए लेते आना और मेरी मूर्खता देखिये कि अवचेतन मन के प्रभाव में मैंने वह नोट पकड़ भी लिया. बस फिर क्या था, तभी से न उनके दफ्तर जा रहा हूँ और दुआ करता हूँ कि कहीं किसी प्रदर्शन वगैरह की जगह उनसे सामना न हो जाय…  Price of onion, pyaj, hindi article, kejriwal, sisodia, Mahangai

उनकी तो छोड़िये, मेरे घर में भी देशी प्याज ख़त्म हो गयी है और श्रीमतीजी रोज धमका रहीं हैं कि रोज रट रही थी कि प्याज खत्म हो गयी है, लेकिन तुम्हारी नींद खुले तब तो जाओ. अब बिना प्याज के ही खाना बनेगा! मन ही मन कोस रहा हूँ देशी प्याज भरे ट्रैक्टर को और सोच रहा हूँ कि उसका ट्रैक्टर अब आ क्यों नहीं रहा? मेरे इस अनुभव से इतर सोचा जाय तो पिछले कई सालों से महंगाई मापने का सबसे बढ़िया सेंसेक्स बना हुआ है प्याज. यह न सिर्फ महंगाई – सूचक यंत्र की तरह कार्य करता है, बल्कि तत्कालीन सरकार पर इससे बड़ा सटीक हमला भी किया जाता है. सुना तो यह भी है कि प्याज में सरकार तक गिराने की ताकत निहित होती है, बस विपक्ष द्वारा जनता को थोड़ा उकसाना ही तो होता है. इस बार प्याज न केवल दिल्ली सरकार को, बल्कि केंद्र सरकार को भी अपनी गंध महसूस करा रही है. प्याज की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सचेत हो गया है. प्‍याज के आयात के लिए भारत सरकार द्वारा एक निर्णय ले लिया गया है और 10,000 मीट्रिक टन प्‍याज के लिए एक निविदा भी जारी की गई है जो 27 अगस्‍त, 2015 को खुल रही है. घरेलु बाजार में प्‍याज की उपलब्‍धता को बढ़ाने के लिए, प्‍याज के न्‍यूनतम निर्यात मूल्‍य को आने वाले समय में प्रति मीट्रिक टन 700 अमरीकी डॉलर तक बढ़ाने का फैसला किया गया है. इसका मतलब यह है कि विदेशों में प्याज महँगी भेजी जाएगी, जिससे इसका निर्यात कम होगा और घरेलु बाजार में इसकी उपलब्धता बढ़ेगी Price of onion, pyaj, hindi article by mithileshऔर इसके मूल्य पर नियंत्रण होगा. खैर, यह सब प्रयास करने की औपचारिकता अपनी जगह है और प्याज की रुलाई अपनी जगह. पता नहीं, भारत की जनता को भी क्या रोग है कि जो चीज महँगी होने की अफवाह फैलती है, उस पर वह टूट पड़ती है. आखिर, प्याज की इतनी भी क्या जरूरत है कि उसके बिना जीवन ही न चले, जबकि भारत में कई सम्प्रदाय और उसे फॉलो करने वाले प्याज लहसन को तामसिक भोजन मानकर उसका सेवन नहीं करते हैं. जनता को समझना चाहिए कि क्या प्याज का सेवन न करने से उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है? बहरहाल, लोकतंत्र में जनता की इच्छा है कि वह प्याज एक किलो खरीदे या पांच किलो, लेकिन कम से कम केजरीवाल सरकार को बदनाम तो न करे! आखिर, कोई प्याज खाए न खाए, उससे दिल्ली के मुख्यमंत्री को भला क्या मतलब? वह तो एक के बाद एक फिल्म देखे जा रहे हैं और इसमें जनता खलल क्यों डाले? उनके विधायक मारपीट और दुसरे आरोपों में गिरफ्तार होते जा रहे हैं, मगर वह बॉलीवुड को अनदेखा कैसे कर दें? गब्बर इज बैक, मशान और अब मांझी: माउंटेन मैन सहित उनका ट्विटर हैंडल फिल्मों की तारीफ से भरा हुआ है. इसके अलावा, देश की जनता उनको बिहार जाकर वहां की भलाई के लिए बुला रही और दिल्ली की जनता है कि प्याज-प्याज शोर मचाये हुए है. खैर, उनकी सरकार ने जनता पर रहम करते हुए उसके लिए अडवाइजरी जारी की है. अब कृपया जनता यह न पूछे कि इसके लिए एलजी से परमिशन ली कि नहीं? बहरहाल, इस अपील में  दिल्ली सरकार ने लोगों से घबराकर प्याज की खरीदारी में शामिल नहीं होने की अपील की है और कहा कि प्याज के पर्याप्त भंडार ‘केजरीवाल सरकार’, मतलब दिल्ली सरकार के पास उपलब्ध हैं और वह राशन की दुकानों तथा मोबाइल वैन के जरिये 30 रुपये किलो प्याज बेचना जारी रखेगी. इसके लिए विकास मंत्री गोपाल राय तथा खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री असीम अहमद खान ने राष्ट्रीय राजधानी में प्याज की उपलब्धता और कीमतों की स्थिति की तथाकथित समीक्षा भी की है, जिससे दिल्ली की जनता की बेवजह चिंता दूर हो सके. यदि इन दोनों मंत्रियों से काम न बना तो फिर दिल्ली के उप मुख्यमंत्री सिसोदिया इस मामले को देखेंगे, फिर कहीं केजरीवाल साहब का नंबर आएगा. खैर, इस प्याज के झंझावातों से सरकारों का सीधा रिलेशन किस प्रकार है, इसे समझने के लिए बड़े-बड़े विश्लेषक अपना एंटीना सही दिशा में लगाए हुए हैं मगर प्याज है कि मानता नहीं और शेयर बाजार के सेंसेक्स की ही तरह कभी ऊपर तो कभी नीचे गोते लगता रहता है, बिना किसी नियंत्रण के! हम जैसे लोगों का मानना है कि प्याज के दायरे पर बातचीत के लिए एकPrice of onion, pyaj, hindi article, farmers in India पूरे ग्रन्थ की रचना की जा सकती है, जिसमें पिछली केंद्र सरकार के एक मंत्री का बयान भी शामिल किया जाना चाहिए कि जब कीमतें बढ़ती हैं तो उसका लाभ किसानों को मिलता है, इसलिए महंगाई बढ़नी चाहिए! अब प्याज की इस बढ़ी हुई कीमत का कितना हिस्सा किसानों तक पहुँच रहा है, यह उनके आत्महत्या और कर्ज के आंकड़ों के माध्यम से सरकार तक जरूर पहुंचेगा. वैसे एक आंकड़ा और भी है किसानों का जिस पर गौर किये जाने की जरूरत है, प्याज के बहाने ही सही. यह खबर नए नए बने तेलंगाना राज्य से है. तेलंगाना सूखे के दौर से गुजर रहा है, जबकि खेत में खड़ी खरीफ की फसल को पानी के अभाव में सूखकर बर्बाद होने से बचाने के लिए धान की खेती करने वाले किसान बेहद जहरीले रसायन ऑक्सीटॉसिन का सहारा ले रहे हैं. ऑक्सीटॉसिन जानवरों में पाया जाने वाला हॉर्मोन है जिसका सेवन करने से इंसान पर बेहद खतरनाक और जहरीला असर पड़ सकता है. प्रतिबन्ध होने के बावजूद, किसान ऑक्सीटॉसिन का इस्तेमाल सब्जी और फल की खेती में पैदावार बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में करते हैं. खैर, किसानों की बदहाली और आम जनमानस के स्वास्थ्य की चिंता है ही किसे, क्योंकि सरकारें तो प्याज के दायरे में ही उलझकर रह गयी हैं और बची खुची उलझनें पाकिस्तान जैसे देश के साथ ड्रामा करने में खर्च हो जा रही है. है न !!

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