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आतंकियों से निबटने में न हो राजनीति

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पिछले दिनों ऊफ़ा में भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तानी पीएम की बैठकों के बाद कुछ उम्मीद जगी थी कि कम से कम 21वीं सदी में दोनों देश अपने देश की गरीब जनता पर तरस खाएंगे और आतंक की राह छोड़ने की संभावनाएं तलाशेंगे. लेकिन, कुत्ते की दुम में कितना भी घी लगाया जाय, उससे वह सीधी तो हो नहीं जाती है. नरेंद्र मोदी ने भी पाकिस्तानी पीएम से अपनी पहल पर बात की, इसलिए विपक्षी नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री पर तीखा हमला भी किया जा रहा है. केंद्र की मोदी सरकार के गठन के बाद पंजाब में बड़े आतंकी हमले को अंजाम दिया गया. हालाँकि, पंजाब पुलिस के जवानों ने सफलतापूर्वक आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया, किन्तु इस आपरेशन में 5 जवानों समेत 3  नागरिकों की भी मौत हो गयी.  इस हमले के बाद जहाँ पंजाब में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने आपात बैठक बुलाई और पूरे पंजाब में अलर्ट जारी कर दिया, वहीँ गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीसीएफ़ के महानिदेशक डीके पाठक से बात की और भारत-पाकिस्तान सीमा पर चौकसी बढ़ाने के तत्काल निर्देश दिए. इन प्रशासनिक मुद्दों को सफलतापूर्वक हैंडल करने के बाद, इस मुद्दे पर अनपेक्षित राजनीति भी शुरू हो चुकी है. इस मुद्दे पर एक तरफ जहाँ संसद को ठप्प किया गया, वहीँ दूसरी ओर भाजपा और मोदी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी शुरू कर दिए गए. गौरतलब है कि इस प्रकार का विरोध करने के लिए, हमारे राजनीतिक दल 24 घंटे भी इन्तेजार करने की ज़हमत नहीं उठा सके. हमारी मानसिकता का ऐसा आलम देखकर यकीन नहीं होता है कि हम अपने देश की एकता, अखंडता के प्रति किस हद तक गैर-जिम्मेवार हैं. पंजाब में हुए इस आतंकी हमले में कई दूसरी बातें भी सामने आयीं, जिन्हें जोड़ने पर खतरनाक संकेत उभरते हैं. एक तरफ कुछ देशद्रोही खालिस्तान के दौर की बातें करने लगे हैं, जिनमें पाकिस्तानी सोशल मीडिया के यूजर्स भी शामिल हैं. पाकिस्तान में भारत विरोधी ट्रेंड कोई नयी बात है नहीं, इसलिए इस पर आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए, किन्तु सच यह है कि उसके द्वारा खालिस्तान के मुद्दे को उकसाया जाना जरूर गंभीर है. इस हमले के दूसरे एंगल के रूप में अमरनाथ यात्रा पर बड़े हमलों की साजिश की बातें कहीं जा रही है, जो घाटी में तनाव उत्पन्न करने और आतंक का नया दौर शुरू करने की कोशिश भी हो सकती है. हालाँकि, पाकिस्तान ने कूटनीतिक चाल चलते हुए पंजाब में हुए आतंकी हमले की निंदा जरूर की है, किन्तु पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का वक्तव्य गौर करने लायक है कि हमलावर बॉर्डर पार से ही आये हैं और इस बारे में सुरक्षा एजेंसियों ने अलर्ट भी जारी किया था. इस अलर्ट को गंभीरता से न लेने के लिए, प्रकाश सिंह बादल ने केंद्र सरकार पर अपनी भड़ास भी निकाली है और कहा है कि जब सुरक्षा अलर्ट था तब सीमा को सील क्यों नहीं किया गया. पंजाब में ही रेलवे ट्रैक पर ज़िंदा बम मिलने की पुष्टि भी हुई है, जिसके कारण ट्रेनों की आवाजाही को भी रोकना पड़ा. चर्चित नेता बन चुके अरविन्द केजरीवाल ने भी पंजाब में आतंकी हमलों की निंदा की है, लेकिन सोशल मीडिया पर उनकी कड़ी आलोचना हो रही है, जिसमें उनके द्वारा पुलिसवालों को कहे गए ‘ठुल्ला’ बयान की निंदा करते हुए यूजर्स पूछ रहे हैं कि आतंकी हमलों में अपनी जान गंवाने वाले पुलिस सिपाही ‘ठुल्ला’ हैं तो केजरीवाल जैसे नेता क्या हैं? केजरीवाल की पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा खालिस्तान समर्थक होने की बातें भी सामने आ रही हैं, जिसकी कड़ी निंदा की जा रही है. ऐसा भी नहीं है कि विपक्ष हर सवाल गलत ही पूछ रहा है, बल्कि उसके द्वारा उठाये गए प्रश्न कई बार जायज भी प्रतीत होते हैं. जैसे, क्योंकि सीमा सुरक्षा के अतिरिक्त आतंकियों को हथियार निश्चित रूप से लोकल सप्लाई से ही मिले होंगे, उन्हें ध्वस्त करने की जिम्मेवारी किसकी है. पंजाब के मुख्यमंत्री बेशक, केंद्र पर इंटेलिजेंस फेल्योर का आरोप लगा दें, किन्तु सच तो यह भी है कि उनकी लोकल इंटेलिजेंस भी फेल हुई है. इसके अतिरिक्त, एक ओर दीनापुर थाने में छिपे तीनों आतंकी पूरी तैयारी के साथ जवानों का मुकाबला कर रहे थे, वहीं पंजाब पुलिस अपने जवानों की सुरक्षा को लेकर इतनी आश्वस्त थी कि उन्हें बुलेट प्रूफ जैकेट्स और हेलमेट देना भी जरूरी नहीं समझा. आतंकी AK-47 से लड़ रहे थे तो दूसरी ओर पुलिस के जवान पुरानी हो चुकी सेल्फ लोडिंग राइफल्स (एसएलआर) से उनका सामना कर रहे थे. आखिर, पंजाब पुलिस के जवान बिना किसी सुरक्षा के आतंकियों से लोहा ले रहे थे, तो इसकी जिम्मेवारी किसकी बनती है. उनके पास न तो बुलेट प्रूफ जैकेट्स थीं, और न ही उन्हें सुरक्षा हेलमेट के साथ अभियान में उतारा गया था जो अभियान को लेकर नासमझी और एक व्यापक रणनीति की कमी को साफ दर्शाता है. इसलिए आरोप-प्रत्यारोप के अलावा, देश की एकता और अखंडता के लिए, इस कठिन घडी में राजनीति की बजाय अगर देशहित को ध्यान में रखा जाय तो पक्ष और विपक्ष के साथ राज्य सरकार को भी अपना सही कर्त्तव्य आप ही समझ आ जायेगा, जो किसी भी राजनीति से परे होगा और शायद यही देशहित का मूल भी है. इसके अतिरिक्त,  सीमा और लोकल इंटेलिजेंस के अलावा पुलिस का आधुनिकीकरण भी मुख्य मुद्दा है, जिसपर ध्यान दिया जाना उतना ही आवश्यक है, जितना तुच्छ राजनीति से निबटने की इच्छाशक्ति होना.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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